Monday, May 22, 2017

चन्द्रा सायता

एक मुक्तक -एक प्रयास


पलकें उठते बैठते ,हर वक्त
नजर पे गश्त लगातीं हैं
जब पलकें सम्मोहित हो जाएं
नज़र को फरार होना ही है।


डॉ चन एक मुक्तक -एक प्रयास

पलकें उठते बैठते ,हर वक्त
नजर पे गश्त लगातीं हैं
जब पलकें सम्मोहित हो जाएं
नज़र को फरार होना ही है।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄👎🎄

हाइकू

     जीवन मिले
     रवि रश्मियाँ आई
     कुसुम खिले।

   पलकें उठीं
   प्रेम का स्पर्श पाया
   वापस जुटीं।

   सपन तेरे
   स्याही नहीं कलम
   कागद कोरे ।

   भक्ति रस में
   रमा हरी नाम है
  कण्ठ कण्ठ में ।

दृष्टि चंचल
बनाते हैं,भागते
मृग शावक ।

इच्छा अपार
कहते सब ज्ञानी
झूठा संसार।

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