Friday, December 5, 2025

डॉ सुषमा रावत

मेरे विचार

प्रेषक- डॉ सुषमा रावत

मैने कभी नही सुना के अमेरिका में  बोर्ड इग्जाम के रिजल्ट आ रहे हैं या यूके में लड़कीयो ने बाजी मार ली है या आस्ट्रेलिया में 99•5 % आऐ है किसी छात्र के ..

मई जून के महीने में हिन्दुस्तान में मानसून के साथ साथ हर घर में दस्तक देती है एक भय एक उत्तेजना ,एक जिज्ञासा ,एक मानसिक विकृती...हर मा,हर बाप,हर बोर्ड के  इग्जाम मे बैठा बच्चा हर बीतते हुए पल को   एक ओबसेसन एक डिप्रेशन एक इनसेक्योरीटी में काट रहा होता है ..
के क्या होगा ??
मानसून दुनिया में सिर्फ इंडियन उपमहाद्वीप की निशानी है ..पर इन्सेक्योरीटी और मानसिक अवसाद का ये मेरीट लिस्ट वाला ये नया मानसून देश के हर हिस्से में तनाव और अवसाद की बारिश करने में काफ़ी असरदार हो चुका है

माँ बाप फ़सल की तरह बच्चो को पाल रहे है के कब फ़सल पके कब उनके अधूरी रह चुकी अकाँक्षाऐ पूरी  होगी कब वे फ़सल काटेगे..

वे या उनके सपने बच्चो की लाइफ को गाइड नही कर रहे...हमारे पूंजीवादी इनवेस्टर्स को क्या प्रोडक्ट चाहिये इस हिसाब से शिक्षा और उसके उद्देश्य तय हो रहे हैं ..एक परिवार सुख चैन त्याग  ..दिन रात खल के ,सँघर्षो ,घोर परीश्रम में गुज़र जाता है उस परीवार का अपना अस्तित्व और सुख चैन और मानवीय भावनाऐ इसलिये भेंट चढ जाती है क्यूके टीसीएस को एक बेहतरीन सोफ्टवेयर डेवलेपर चाहिये..या मेकेन्से को बेस्ट ब्रेन चाहिये...या रिलायन्स को बेहतरीन गेम डिजाइननर चाहिये..
हमारी शिक्षा व्यवस्था व उसके आदर्श कहाँ रह गये...???

हमारे स्कूल देश के बेस्ट नागरिक नही देश के बेस्ट मजदूर बनाने में दिन रात एक करके जुटे हुए हैं

और लानत है उन माँ बापो के लिये जो बच्चो को बच्चा नही एक मेकेनिकल डीवाईस बनाने को प्रतिज्ञाबद्ध  हैं

बच्चो को जीने दो दुनिया खत्म नही होने जा रही...
उन्हे बेस्ट इम्प्लोई नही बेस्ट सीटीजन बनाने में यकीन रखो दोस्तो
बचपन की भी खुद से कुछ अपेक्षाऐ होती हैं अपने निस्वार्थ स्वप्न होते हैं  उनका हमारे लिये कोई अर्थ नही पर..बच्चो के लिये वो जन्नत से कम नही ..प्लीज बच्चो की दुनिया मत उजाड़ो ..प्लीज उन्हे मनोरोगी मत बनाओ ...

क्या है ये ..ये एक मानसिक रुग्णता ही तो है ..टोपर्स की खबरें..उन्हे मिठाई खिलाते माँ बाप की फोटो ..क्या ये एक आम सामान्य स्तर के बच्चो को मानसिक हीनता की अनुभूती नही देंगे अरे..टापर तो दो चार होंगे बाकी देश का बोझ तो 99 % इन्ही फूल से कोमल सामान्य बच्चो ने ही उठाना है... उनकी मुस्कान मत छीनो ..देश से उसकी सृजनात्मक शक्ति मत छिनो ..
जैसे हमारे लिये नेपाल के माँ बाप मजदूर तैय्यार कर रहे है
वैसे ही तुम टाटा,रिलायंस एल एंड टी ,मारुति ,मेकेन्से ,देन्सू , etc के लिये मजदूर तैय्यार कर रहे हो
वे कुछ भी बन जाऐ ..एमएनसी  में सीईओ हो जाऐ पर जो बचपन की रिक्तता तुमने आरोपित कर दी है वो उन्हे जीवन भर खलेगी और मानवीय विकृतीयो के रुप में फलेगी ..आपको बेस्ट सीईओ मिलेंगे जिनकी प्राथमिकता उनकी कंपनी होगी ,देश नही.....

Saturday, May 11, 2024

गोष्ठी दिनांक 11. 5. 24

सपन सलोने बचपन के

बचपन के सपन सलोने जो
गुड्डे गुड़िया के अपने जो
बैठे बैठे ही उड़ते थे
अनबोलेपन में कुढ़ते थे

खुद को उनमें हम खोते थे
सिरहाने ले कर सोते थे
कुछ मेरे थे, कुछ उसके थे
गुत्थमगुत्था हो सिसके थे

फिर इक दिन ऐसा भी आया
फिर वक्त बहेलिया बन छाया
सपने फँस कर उन जालों में
टूटे बिखरे सब ख्यालों में

थे सपन कपूर के बने हुए 
जाने कब, सब काफूर हुए
वे दिन थे कितने सोने के
थे प्रेम बीज कुछ बोने के

सपनों पर सब कुछ वारा
सपनों की मधुमय रसधारा 
जीता करती वो सदा सदा, 
पर हर खेल सदा मैं ही हारा

इसकी तो थी आदत मेरी, 
उसकी हर जिद होती पूरी
फिर भी बस मैं तो मैं ही था
इस रिश्ते की महकी कस्तूरी

सब से न्यारी बस वह थी, 
था मुट्ठी में आकाश भरा
मन के शहदी मधुबन में
जब जी चाहा मधुमास झरा

बिना पंख हम उड़ते फिरते
छुटका सा था संसार हमारा
पर जो था, जैसा भी था वह
कितना न्यारा, कितना प्यारा 

हम समझे थे ...
धरती तो एक गोला है
हाथों पर उगा फफोला है
फिर से कहीं मिलेंगे सब
पर बीत न पाई काली शब

हमने चुटकी में वो खोया
जो बचपन भर हमने पोया
ढूँढा मस्तक की लेखा में
टूटे तारों की रेखा में

ना गुड्डा था, ना गुड़िया थी
जो आफत की इक पुड़िया थी
इक दिन भूले भटके में
टूटे दर के उस खटके में

चुन्नी गुड़िया की उलझी पाई 
जो दीदी से थी सिलवाई 
अब केवल वही..
बस केवल वही....
हाँ! केवल वही गवाही है,
हाँ! केवल उसे छुपाई है

यादों की बड़ी तिजोरी में
किस्मत की बरजोरी में।
मेरा सब कुछ तुम ले लो
सपनों से कोई मत खेलो

पर, किस्मत में यही बदा है
अपने काँटो से फूल घिदा है
गुड़िया का काजल रहने दो
उसके कानों में सब कहने दो

वरना वे बोल अबोले ही 
इस मिट्टी संग जल जायेंगे
शायद ये सब जल कर ही
उन रूमानी सपनों में
जा कर फिर मिल जायेंगे।

रब से है यह बड़ी शिकायत 
क्यों फिर ऐसी पड़ी रवायत
जो सपन बने, बने फिर बिखरे
हुण्डी यह तो है वो ही, 
भूले से भी जो ना शिकरे

क्यों रच डाला मधुर मेल?
अगर टूटना!, तय था खेल
जो मिला नहीं, वह खोया ही है
भाग जगा इक पल को, फिर सोया ही है

तुम क्या समझे ? 
क्या यह केवल मेरे ही संग घटा है?
नहीं नहीं! सब ओर बँटा है

तुम! 
तुम!! 
और हाँ, तुम भी!
इसी तरह से कहीं कभी, 
हर सक्ष लुटा है
बिखरा बादल नीले नभ में
फिर से क्या वह कभी जुटा है?

अब ढूँढ सको तो ढूँढो, मुझको मुझमें,
खोया कब से मैं ही मुझमें
सपने और सपनों के मेले
निठुर वक्त ने सदा धकेले

बचे न वे डेरे ना तंबू, 
ना खीले और न वे बंबू
तू बंजारन, मैं बंजारा
चल तू जीती, ले मैं हारा
चल तू जीती, ले मैं हारा

रामनारायण सोनी

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आ चरण

चलो मित्र आज कुछ आ चरण 
करते हैं 
यह पहले ही बता दें कि हम वामन 
नहीं है
कहो शुरुआत कहां से करें जल्दी 
बताओ 
यह भी जान को कि चरण असीमित 
नहीं है 
स्वांत: सुखाय या दुखाए चरण को 
अपनाओ 
भीरू बनकर बैठे रहोगे तो आलसी 
कहे जाओगे 
लंबाई में चरण की सीमा धुर दक्षिण से 
परमोत्तर पाती हो
क्या कहें चौड़ाई में सूर्योदय से सूर्यास्त 
तक हो जाता है 
आ चरण का ये पहला चरण बड़ा ही 
व्यापक है 
दूसरा चरण उठाया और आदित्य एल से 
प्रज्ञान को छुआ 
मंगल के प्रयास में रंग तक दुनिया का 
बदल डाला 
अब यह विचार करना बहुत जरूरी कि 
तीसरा कहां रखना 
तीसरे का चरण में ऊंच-नीच के अंतर को 
समतल कर सहज पथ करते हैं 
विराट आभास करा कर बाहुबलियों को 
नतमस्तक करना 
वामन ने ही ये  सब कर दिखाया था क्या
कहना 
चरण भले ही छोटा हो, पर कदम बड़ा 
उदात्त था रखना 
आ चरण एक आव्हान है, अपने कदम 
पर थोड़ा ध्यान रखना 

व्रजेंद्र नागर 
251 श्री मंगल नगर इंदौर
🏵️🌻🌹💐

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मां तुझे प्रणाम 

सबसे पहले  खुदा ने मां को बनाया होगा
  सजदे में सर सबसे पहले उसने ही झुकाया होगा।।

मां की ममता का अंदाज़ा तुम क्या लगाओगे दोस्तो
चाक हुआ कलेजा भी बोल उठा बेटा चोट तो नहीं लगी।।

 मां ही गीता रामायण और कुरान है
 मां के चरणों में काशी काबा और  जहान है।।

मां तुझे शत शत प्रणाम है।
 मां तुझे शत शत प्रणाम है।।

🙏🙏🙏🙏🙏
डॉ सुधा चौहान राज इंदौर

 ❤️🌹❤️❤️🚩🙏




Wednesday, July 12, 2023

गोष्ठी दिनांक 8.7.23

विवरणिका
इन्डियन सोसाइटी ऑफ ऑथर्स
इन्दौर चेप्टर, इन्दौर

दिनांक 8 जुलाई को कुंदकुंद ज्ञानपीठ इंदौर में इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स, इंदौर चैप्टर इंदौर की मासिक काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। मुख्य अतिथि सुश्री लिली डावर रही जो नामचीन्ह शिक्षाविद्, समाजसेवी, गायिका, कवयित्री, मंच संचालक-संयोजक, मोटिवेशनल स्पीकर, और प्राचार्य हैं। वे मीरा और कबीर के पदों का मधुर स्वरों में गान करती हैं व कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। शासकीय श्री अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय में वे निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। 
इन्सा के नियमित सदस्य श्री रविंद्र नारायण पहलवान (उपाध्यक्ष), श्रीमती आशा जाकड़ व श्रीमती ज्योति जैन को उनके साहित्यिक क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि प्राप्त करने पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा हाल ही में सम्मान प्रदान किए गए हैं। उन्हें इन्सा के द्वारा पारम्परिक तौर पर इस सभा में स्मृति चिन्ह प्रदान किये गये। इसके पश्चात इस माह में जिन सदस्यों का जन्म दिवस अथवा परिणय दिवस रहा उन्हें स्मृति चिन्ह व बधाई प्रदान की गई। 
गोष्ठी के दूसरे सत्र में मुख्य अतिथि सुश्री लिली संजय डावर ने अपने मनमोहक स्वर में सरस्वती वंदना 'गूंजे धरा गगन' का गान किया। वे कहती हैं-दिवंगत साथी श्री संजय डावर की सूक्ष्म उपस्थिति उन्हें सदैव महसूस होती है जिसे वह संजय स्पंदन का नाम देती है। वंदना के पश्चात उन्होंने अपने स्वरचित गीत- ना मैं शायर हूं, ना हूं कवयित्री, ना फनकार हूं, मैं नगमों की झंकार हूं, का सस्वर पाठ करके सभा को आनंदित कर दिया और फिर अपनी ही एक और रचना "सावन आया झूम के" की प्रस्तुति शास्त्रीय संगीत में राग मेघ मल्हार पर आधारित गाकर वातावरण को संगीतमय बना दिया। अपने उद्बोधन में उन्होंने पुस्तक, पुस्तकालय, पाठक और पठन का हमारे जीवन में महत्व समझाया। उनका एक विशिष्ट अभियान "पुस्तकें बुलाती हैं" लायब्रेरी के माध्यम से जारी है। 
इन्सा की इस सभा में आहूत वाक्य "बदरवा झूम के बरसो" के अन्तर्गत २६ सदस्यों ने बरखा ऋतु से संदर्भित स्वरचित रचनाओं का पाठ किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में आशीष त्रिवेदी ने संस्था की गतिविधियों, उद्देश्यों और क्रिया कलापों से अवगत कराया।
वैसे तो अधिकतर सदस्यों की रचनाएँ सुन्दर थी लेकिन श्रीमती आशा जाकड़, श्रीमती आशा कुशवाहा, श्रीमती ज्योति जैन, राज सांधेलिया, डॉ रवीन्द्र दत्तात्रेय ढोबले और रामनारायण सोनी की रचनाओं को विशेष सराहा गया। संस्था के सचिव रामनारायण सोनी ने शानदार संचालन किया। आभार व्रजेन्द्र नागर ने माना।

अध्यक्ष
आशीष त्रिवेदी

Thursday, May 14, 2020

Sunday, July 23, 2017

डॉ रवीन्द्र पेहलवान

🤔🙏🏼 *"दरवाजे "*

*पहले दरवाजे नहीं खटकते थे..*

रिश्ते -नातेदार
मित्र -सम्बन्धी
सीधे
पहुँच जाते थे...
रसोई तक

वहीं जमीन पर पसर
गरम पकौड़ियों के साथ
ढेर सारी बातें
सुख -दुःख का
आदान -प्रदान

*फिर खटकने लगे दरवाजे...*
मेहमान की तरह
रिश्तेदार
बैठाये जाने लगे बैठक में..
नरम सोफों पर

कांच के बर्तनों में
परोसी जाने लगी
घर की शान...

*क्रिस्टल के गिलास में*
*उड़ेल कर ...*
*पिलाई जाने लगी.. हैसियत.*

धीरे -धीरे
*बढ़ने लगा स्व का रूप..*

*मेरी जिंदगी ... मेरी मर्जी*
*अपना कमरा..*
*अपना मोबाइल ..*
*कानों में ठुसे..द्वारपाल..*
*लैपटॉप..*

पर कहीं न कहीं
स्नेहपेक्षी मन....

*प्रतीक्षा रत है...*
*किसी अपने का..!!!*

*पर अब.....*
*दरवाजे नहीं खटकते हैं ..!!!*
😎🤔🙏🏼

Friday, June 16, 2017

अलका जैन

झंडा ऊंचा रहे हमारा
बिछोने पर नींद नहीं आती
अर्थी बनवा दो यारो
फूलों से काम नहीं चलेगा अंगारो पर सुला दो यारों
आशियाने की दीवार पर अपनी तस्वीर छोड़ कर मैं सोना चाहता हू कफन ओड कर
कफन बने तिरंगा प्यारा यारो
यही है कोशिश यही है आरजू आपनी
सरहदें लहू मांगती है  कुर्बानी के लिये हम को तैयार रहना होगा
झंडा ऊंचा रहे हमारा यह जज्बा हर भारतीय मै होना चाहिेए

बिछोने पर नींद नहीं आती अर्थी बनवा दो यारों
फूलो से काम नहीं चलेगा अंगारो पर सुला दो यारो

Saturday, May 27, 2017

हरमोहन दास नेमा

गरमी  का फ़ायदा (हाइकू ) मालवी  में 

पेलो फ़ायदों -----
ठंडी  लस्सी  पिवांगा गुण  करेगी
दूजो  फ़ायदों
तड़का से बचांगा
घर में रांगा
तीजों फ़ायदों
घर में बैठांगा  तो
पढ़ा -लिखांगा
चौथों फ़ायदों
जादाँ  पढ़ांगा-लिखांगा
लेख लिखांगा ।
पाँचवो  लाभ -
संजा के घूमांगा तो
मज़ों आयगो ।