Tuesday, May 23, 2017

सतीश राठी


   🌁  - ताँका - 🌁
1
गहरा ताल
बचा लिया है जल
बची है नदी
सूरज के ताप से
बची रेत होने से
2
बन बैठी है
सीने पर वजन
याद- पहाड़
कैसे भुला दूँ अब
बजाया जो सितार।
3
बरसात में
भीगती रही वह
समूची रात
आँसू बन बहे थे
बवण्डर बादल।
4
हँसते लब
दिल में है घाव सा
खामोश मन
गम की नदिया में
कागज की नाव सा
5
नदी ने पूछा
प्रेम करते हो क्या
दिल ने कहा
प्रेम की कलकल
सीखी है तुमसे ही
-0-

2 comments:

  1. चौथ हाइकु दूसरी लाइन सुधार कर पढ़ें
    दिल में है घाव सा

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  2. नदी ने पूछा
    बेहतरीन तांका ।
    प्रेम की पावनता और गरिमा को आँखों के समक्ष
    शब्दचित्र बन कर आनंद की अनुभूति कराता है ।

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