सपन सलोने बचपन के
बचपन के सपन सलोने जो
गुड्डे गुड़िया के अपने जो
बैठे बैठे ही उड़ते थे
अनबोलेपन में कुढ़ते थे
खुद को उनमें हम खोते थे
सिरहाने ले कर सोते थे
कुछ मेरे थे, कुछ उसके थे
गुत्थमगुत्था हो सिसके थे
फिर इक दिन ऐसा भी आया
फिर वक्त बहेलिया बन छाया
सपने फँस कर उन जालों में
टूटे बिखरे सब ख्यालों में
थे सपन कपूर के बने हुए
जाने कब, सब काफूर हुए
वे दिन थे कितने सोने के
थे प्रेम बीज कुछ बोने के
सपनों पर सब कुछ वारा
सपनों की मधुमय रसधारा
जीता करती वो सदा सदा,
पर हर खेल सदा मैं ही हारा
इसकी तो थी आदत मेरी,
उसकी हर जिद होती पूरी
फिर भी बस मैं तो मैं ही था
इस रिश्ते की महकी कस्तूरी
सब से न्यारी बस वह थी,
था मुट्ठी में आकाश भरा
मन के शहदी मधुबन में
जब जी चाहा मधुमास झरा
बिना पंख हम उड़ते फिरते
छुटका सा था संसार हमारा
पर जो था, जैसा भी था वह
कितना न्यारा, कितना प्यारा
हम समझे थे ...
धरती तो एक गोला है
हाथों पर उगा फफोला है
फिर से कहीं मिलेंगे सब
पर बीत न पाई काली शब
हमने चुटकी में वो खोया
जो बचपन भर हमने पोया
ढूँढा मस्तक की लेखा में
टूटे तारों की रेखा में
ना गुड्डा था, ना गुड़िया थी
जो आफत की इक पुड़िया थी
इक दिन भूले भटके में
टूटे दर के उस खटके में
चुन्नी गुड़िया की उलझी पाई
जो दीदी से थी सिलवाई
अब केवल वही..
बस केवल वही....
हाँ! केवल वही गवाही है,
हाँ! केवल उसे छुपाई है
यादों की बड़ी तिजोरी में
किस्मत की बरजोरी में।
मेरा सब कुछ तुम ले लो
सपनों से कोई मत खेलो
पर, किस्मत में यही बदा है
अपने काँटो से फूल घिदा है
गुड़िया का काजल रहने दो
उसके कानों में सब कहने दो
वरना वे बोल अबोले ही
इस मिट्टी संग जल जायेंगे
शायद ये सब जल कर ही
उन रूमानी सपनों में
जा कर फिर मिल जायेंगे।
रब से है यह बड़ी शिकायत
क्यों फिर ऐसी पड़ी रवायत
जो सपन बने, बने फिर बिखरे
हुण्डी यह तो है वो ही,
भूले से भी जो ना शिकरे
क्यों रच डाला मधुर मेल?
अगर टूटना!, तय था खेल
जो मिला नहीं, वह खोया ही है
भाग जगा इक पल को, फिर सोया ही है
तुम क्या समझे ?
क्या यह केवल मेरे ही संग घटा है?
नहीं नहीं! सब ओर बँटा है
तुम!
तुम!!
और हाँ, तुम भी!
इसी तरह से कहीं कभी,
हर सक्ष लुटा है
बिखरा बादल नीले नभ में
फिर से क्या वह कभी जुटा है?
अब ढूँढ सको तो ढूँढो, मुझको मुझमें,
खोया कब से मैं ही मुझमें
सपने और सपनों के मेले
निठुर वक्त ने सदा धकेले
बचे न वे डेरे ना तंबू,
ना खीले और न वे बंबू
तू बंजारन, मैं बंजारा
चल तू जीती, ले मैं हारा
चल तू जीती, ले मैं हारा
रामनारायण सोनी
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2
आ चरण
चलो मित्र आज कुछ आ चरण
करते हैं
यह पहले ही बता दें कि हम वामन
नहीं है
कहो शुरुआत कहां से करें जल्दी
बताओ
यह भी जान को कि चरण असीमित
नहीं है
स्वांत: सुखाय या दुखाए चरण को
अपनाओ
भीरू बनकर बैठे रहोगे तो आलसी
कहे जाओगे
लंबाई में चरण की सीमा धुर दक्षिण से
परमोत्तर पाती हो
क्या कहें चौड़ाई में सूर्योदय से सूर्यास्त
तक हो जाता है
आ चरण का ये पहला चरण बड़ा ही
व्यापक है
दूसरा चरण उठाया और आदित्य एल से
प्रज्ञान को छुआ
मंगल के प्रयास में रंग तक दुनिया का
बदल डाला
अब यह विचार करना बहुत जरूरी कि
तीसरा कहां रखना
तीसरे का चरण में ऊंच-नीच के अंतर को
समतल कर सहज पथ करते हैं
विराट आभास करा कर बाहुबलियों को
नतमस्तक करना
वामन ने ही ये सब कर दिखाया था क्या
कहना
चरण भले ही छोटा हो, पर कदम बड़ा
उदात्त था रखना
आ चरण एक आव्हान है, अपने कदम
पर थोड़ा ध्यान रखना
व्रजेंद्र नागर
251 श्री मंगल नगर इंदौर
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3
मां तुझे प्रणाम
सबसे पहले खुदा ने मां को बनाया होगा
सजदे में सर सबसे पहले उसने ही झुकाया होगा।।
मां की ममता का अंदाज़ा तुम क्या लगाओगे दोस्तो
चाक हुआ कलेजा भी बोल उठा बेटा चोट तो नहीं लगी।।
मां ही गीता रामायण और कुरान है
मां के चरणों में काशी काबा और जहान है।।
मां तुझे शत शत प्रणाम है।
मां तुझे शत शत प्रणाम है।।
🙏🙏🙏🙏🙏
डॉ सुधा चौहान राज इंदौर
❤️🌹❤️❤️🚩🙏
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